रामानुजनगर कैलाशपुर
रामानुजनगर की तहसील उपाध्यक्ष अर्चना साहू ने छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोकपर्व छेरछेरा के पावन अवसर पर जिले वाशियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ दी हैं। उन्होंने इस अवसर पर जिले की सुख-समृद्धि, खुशहाली और निरंतर प्रगति की मंगलकामना की।

अर्चना साहू ने कहा कि छेरछेरा महादान, सामाजिक समरसता और दानशीलता का प्रतीक पर्व है, जो छत्तीसगढ़ की समृद्ध, गौरवशाली और मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत परंपरा को सजीव रूप में अभिव्यक्त करता है। नई फसल घर आने की खुशी में यह पर्व पौष मास की पूर्णिमा को बड़े हर्ष और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और परंपराओं को सहेजने वाला पारंपरिक पर्व छेरछेरा शनिवार को ग्रामीण अंचलों में पूरे हर्षोल्लास और उत्साह के साथ अर्चना साहू ने मनाया छेर छेरा। सुबह होते ही गांवों की गलियों में बच्चों और बड़ों की टोलियां निकल पड़ीं। हाथों में झोला, बोरी और इस बार अर्चना साहू के हाथ मे थैला लिए ये टोलियां घर-घर जाकर छेरछेरा मांगती नजर आईं। चारों ओर लोकगीतों की गूंज, गाजे-बाजे की धुन और उल्लासपूर्ण वातावरण ने गांवों को उत्सवमय बना दिया।

छेरछेरा पर्व को लेकर विशेष रूप से बच्चों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे अर्चना साहू ने समूह बनाकर गांव की हर गली, हर मोहल्ले और हर घर तक पहुंचे। घरों के सामने पहुंचकर बच्चों ने पारंपरिक छेरछेरा गीत गाए –
“छेरछेरा माई, कोठी के धान ला हेरहेरा…”
गीतों की मधुर ध्वनि सुनकर घरों में मौजूद महिलाएं और पुरुष बाहर निकले और श्रद्धा व खुशी के साथ बच्चों को दान दिया।

सह सचिव हिमांचल साहू ने भी छेरछेरा के रूप में बच्चों को धान, चावल, रुपए-पैसे दिए। कई बच्चों को चॉकलेट, बिस्किट और मिठाइयां भी दी गईं।
दान देने के दौरान घरों में खुशहाली और अपनत्व का भाव स्पष्ट दिखाई दिया। इस पर्व में अमीरी-गरीबी का कोई भेद नहीं दिखता, हर कोई अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करता है और आनंदपूर्वक इस परंपरा का निर्वहन करता है।

छेरछेरा पर्व का सीधा संबंध खेती-किसानी और फसल कटाई से जुड़ा हुआ है। फसल मिसाई के बाद मनाया जाने वाला यह पर्व किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि इस दिन धान का कुछ अंश दान करने से आने वाले वर्ष में अच्छी फसल होती है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इसी विश्वास के चलते किसान अपने दरवाजे पर आए किसी भी व्यक्ति को खाली हाथ नहीं लौटाते।
मण्डल अध्यक्ष अनिल साहू के अनुसार छेरछेरा केवल दान का पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और भाईचारे का प्रतीक है। इस दिन गांव के लोग आपसी मतभेद भूलकर एक-दूसरे के घर पहुंचते हैं और खुशियां बांटते हैं। यही कारण है कि इस अवसर पर लोग गांव छोड़कर बाहर नहीं जाते, बल्कि गांव में रहकर ही पूरे परिवार और समाज के साथ इस पर्व को मनाते हैं।

इतिहासकारों और बुजुर्गों के अनुसार छेरछेरा पर्व की परंपरा छत्तीसगढ़ में प्राचीन काल से चली आ रही है। कहा जाता है कि पुराने समय में राजा-महाराजा भी इस पर्व को बड़े धूमधाम से मनाते थे और प्रजा को अन्न दान दिया जाता था। समय के साथ यह परंपरा जन-जन तक पहुंची और आज भी उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाई जा रही है।
कैलाशपुर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में दिनभर छेरछेरा पर्व की रौनक बनी रही। गांव की गलियों में बच्चों की टोलियां घूमती रहीं, गीत गूंजते रहे और दान का सिलसिला चलता रहा। इस पारंपरिक पर्व ने एक बार फिर साबित कर दिया कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति आज भी जीवंत है और नई पीढ़ी तक पूरी मजबूती के पहुंच रही है।






















































